व्याकरण

व्याकरण क्या है? जानिए परिभाषा, अंग और विशेषताएँ 

व्याकरण (Vyakran) किसी भी भाषा को सही और प्रभावी ढंग से समझने और प्रयोग करने का आधार है। जब हम बोलते या लिखते हैं, तो शब्दों का सही उच्चारण, उनका उचित प्रयोग और वाक्यों की सही संरचना बहुत महत्वपूर्ण होती है। इन सभी बातों को समझने के लिए व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है। हिन्दी व्याकरण हमें भाषा के शुद्ध रूप को सीखने के साथ-साथ वर्ण, शब्द, पद, वाक्य, ध्वनि और लिपि जैसे महत्वपूर्ण विषयों को समझने में मदद करता है। इस लेख में हम व्याकरण की परिभाषा, उसके अंग, हिन्दी व्याकरण की विशेषताएँ, ध्वनि और लिपि तथा साहित्य के बारे में सरल भाषा में विस्तार से जानेंगे। 

व्याकरण क्या है?

व्याकरण (Vyakran) वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भाषा को शुद्ध रूप से बोलने और लिखने के नियमों का ज्ञान प्राप्त होता है। यह भाषा के अलग-अलग भागों को समझने और उनका सही प्रयोग करने में सहायता करता है।

उदाहरण के लिए:

गलत: राम बाजार जाती है।
सही: राम बाजार जाता है।

यहां कर्ता के अनुसार क्रिया का सही प्रयोग करना जरूरी है। ऐसे ही नियमों को समझने में व्याकरण हमारी सहायता करता है।

व्याकरण (Grammar) की परिभाषा

व्याकरण (Vyakran) वह शास्त्र है, जिसकी सहायता से हमें किसी भाषा को सही ढंग से बोलना, लिखना और समझना सीखने में मदद मिलती है।

भाषा को व्यवस्थित रूप से प्रयोग करने के लिए कुछ निश्चित नियम होते हैं। ये नियम संख्या में सीमित होते हैं, लेकिन इनके आधार पर असंख्य वाक्यों और भावों को व्यक्त किया जा सकता है। भाषा में प्रयोग होने वाले इन्हीं नियमों का व्यवस्थित अध्ययन जिस शास्त्र में किया जाता है, उसे व्याकरण कहा जाता है।

व्यक्ति, क्षेत्र और स्थान के अनुसार भाषा के बोलने और प्रयोग करने के तरीके में अंतर दिखाई दे सकता है। इसलिए भाषा का स्वरूप हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कई बार जानकारी की कमी या भ्रम के कारण लोग शब्दों का गलत उच्चारण करते हैं या उनके अर्थ को गलत समझ लेते हैं। इससे भाषा का रूप अशुद्ध हो सकता है। भाषा को शुद्ध और व्यवस्थित बनाए रखना व्याकरण का प्रमुख उद्देश्य है।

वास्तव में व्याकरण भाषा में प्रचलित नियमों का संग्रह और उनका विश्लेषण करता है। इसके माध्यम से भाषा के नियमों को व्यवस्थित और निश्चित किया जाता है, जिससे भाषा का स्वरूप मानक और परिष्कृत बनता है। हालांकि, व्याकरण स्वयं भाषा के नियमों का निर्माण नहीं करता। भाषा बोलने वाले समाज में जिस प्रकार भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसी आधार पर व्याकरण के विद्वान उसके नियमों को निर्धारित करते हैं।

इसलिए कहा जा सकता है कि—

व्याकरण वह शास्त्र है, जिसमें किसी भाषा के शुद्ध और मानक रूप का ज्ञान कराने वाले नियमों का वर्णन किया जाता है।

व्याकरण के उदाहरण -Vyakran Ke Udaharan

आइए कुछ उदाहरणों से इसे समझते हैं—

  1. सीता पेड़ पर चढ़ता है।
  2. हम सभी जाएगा।

पहले वाक्य में ‘सीता’ स्त्रीलिंग शब्द है, इसलिए उसके साथ क्रिया का रूप ‘चढ़ती’ होना चाहिए। इसका शुद्ध वाक्य होगा—
सीता पेड़ पर चढ़ती है।

दूसरे वाक्य में ‘हम सभी’ बहुवचन कर्ता है। इसलिए क्रिया भी बहुवचन के अनुसार होनी चाहिए। शुद्ध वाक्य होगा—
हम सभी जाएँगे।

इन दोनों वाक्यों में हुई अशुद्धियाँ क्रिया से संबंधित हैं।

अब एक और उदाहरण देखते हैं—

मार दिया को ने राम श्याम।

इस वाक्य में शब्दों का क्रम सही नहीं है, इसलिए इसका अर्थ स्पष्ट रूप से समझना कठिन है। यदि इसे सही क्रम में लिखा जाए, तो वाक्य होगा—

राम ने श्याम को मार दिया।

इस वाक्य का अर्थ ‘श्याम ने राम को मार दिया’ से बिल्कुल अलग है। इसलिए वक्ता जिस भाव या अर्थ को व्यक्त करना चाहता है, उसके अनुसार वाक्य में शब्दों का सही क्रम होना आवश्यक है। शब्दों के सही क्रम, कर्ता, कर्म और कारक आदि से जुड़े नियमों का अध्ययन हिन्दी व्याकरण में किया जाता है।

व्याकरण के अंग

भाषा के चार प्रमुख अंग माने जाते हैं—वर्ण, शब्द, पद और वाक्य। इन्हीं के आधार पर व्याकरण को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा जाता है—

  1. वर्ण-विचार
  2. शब्द-विचार
  3. पद-विचार
  4. वाक्य-विचार

1. वर्ण-विचार या अक्षर

भाषा की सबसे छोटी ध्वनि-इकाई, जिसे और छोटे भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता, वर्ण कहलाती है।

जैसे— अ, ब, म, क, ल, प आदि।

वर्ण-विचार के अंतर्गत वर्णमाला, वर्णों के विभिन्न भेद, उनका उच्चारण, प्रयोग तथा संधि आदि का अध्ययन किया जाता है।

2. शब्द-विचार

ऐसे वर्णों के सार्थक मेल को शब्द कहा जाता है, जिससे किसी अर्थ का बोध होता है।

जैसे— कमल, राकेश, भोजन, पानी, कानपुर आदि।

शब्द-विचार में शब्दों की रचना, उनके प्रकार, शब्द-संपदा और अलग-अलग परिस्थितियों में शब्दों के उचित प्रयोग का अध्ययन किया जाता है।

3. पद-विचार

वाक्य में प्रयुक्त शब्द जब किसी विशेष व्याकरणिक रूप और कार्य को व्यक्त करते हैं, तो उनके रूप को पद कहा जाता है।

पद-विचार के अंतर्गत पदों के भेद, उनके रूपों में होने वाले परिवर्तन तथा वाक्य में उनके सही प्रयोग का अध्ययन किया जाता है।

4. वाक्य-विचार

कई शब्द जब उचित क्रम में मिलकर किसी पूर्ण अर्थ का बोध कराते हैं, तो उन्हें वाक्य कहा जाता है।

जैसे—

  • सब घूमने जाते हैं।
  • राजू सिनेमा देखता है।

वाक्य-विचार में वाक्य की संरचना, उसके विभिन्न अंग, पदबंध और विराम-चिह्न आदि का अध्ययन किया जाता है।

हिन्दी व्याकरण की विशेषताएँ

हिन्दी व्याकरण (Hindi Vyakran)का आधार काफी हद तक संस्कृत व्याकरण से जुड़ा हुआ है, फिर भी हिन्दी की अपनी कई अलग विशेषताएँ हैं। हिन्दी को संस्कृत से व्याकरण संबंधी समृद्ध परंपरा विरासत में मिली है। हिन्दी के व्याकरण के विकास में संस्कृत व्याकरण का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।

पं० किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार, हिन्दी ने अपना व्याकरण मुख्य रूप से संस्कृत व्याकरण के आधार पर विकसित किया है। विशेष रूप से क्रिया संबंधी नियमों पर संस्कृत का प्रभाव दिखाई देता है। हालांकि, कुछ स्थानों पर हिन्दी ने संस्कृत की तुलना में सरल नियमों को अपनाया है। यही हिन्दी व्याकरण की अपनी विशिष्टता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिन्दी व्याकरण में संस्कृत की परंपरा का प्रभाव होने के साथ-साथ हिन्दी भाषा की प्रकृति और प्रयोग के अनुसार कई स्वतंत्र विशेषताएँ भी मौजूद हैं।

ध्वनि और लिपि

ध्वनि

ध्वनि केवल मनुष्य से ही नहीं, बल्कि पशुओं और निर्जीव वस्तुओं से भी उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए, कुत्ते के भौंकने और बिल्ली के म्याऊँ-म्याऊँ करने से ध्वनि उत्पन्न होती है। इसी प्रकार पानी के बहने या किसी वस्तु के कंपन से भी ध्वनि पैदा होती है।

व्याकरण में मुख्य रूप से मनुष्य द्वारा उच्चरित ध्वनियों का अध्ययन किया जाता है। मनुष्य के मुख से निकलने वाली ध्वनियाँ कई प्रकार की हो सकती हैं।

कुछ ध्वनियाँ मनुष्य की किसी शारीरिक गतिविधि के कारण उत्पन्न होती हैं, जैसे चलने पर होने वाली आवाज। कुछ ध्वनियाँ अनैच्छिक क्रियाओं से निकलती हैं, जैसे खर्राटे लेना या जँभाई लेना। इसी प्रकार कराहने जैसी ध्वनियाँ भी स्वाभाविक शारीरिक क्रियाओं से उत्पन्न हो सकती हैं।

इनके अलावा कुछ ध्वनियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य अपनी इच्छा से मुख द्वारा बोलता है। इन्हें वाणी या आवाज कहा जाता है।

पहली तीन प्रकार की ध्वनियाँ सामान्यतः अर्थ व्यक्त नहीं करतीं। वाणी अर्थपूर्ण भी हो सकती है और अर्थहीन भी। उदाहरण के लिए, सीटी बजाना या बिना अर्थ का गीत गाना निरर्थक वाणी का उदाहरण हो सकता है। दूसरी ओर, जब वाणी के माध्यम से विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ और अनुभव व्यक्त किए जाते हैं, तो वह भाषा का रूप ले लेती है।

भाषा शब्दों से बनती है और शब्द विभिन्न ध्वनियों के मेल से बनते हैं।

मनुष्य की शारीरिक बनावट लगभग समान होने के बावजूद उसकी भाषा और बोलियों में काफी विविधता पाई जाती है। एक ही भाषा को अलग-अलग क्षेत्रों में बोलने के तरीके में भी अंतर दिखाई देता है। इसके विपरीत, पशुओं की ध्वनियों और बोलियों में मनुष्यों जैसी व्यापक विविधता नहीं होती।

मनुष्य के बीच भाषा का विकास सबसे पहले मौखिक रूप में हुआ। लिखित भाषा का विकास काफी बाद में हुआ। जब मनुष्य को अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई, तब उसने उन्हें लिखित रूप में सुरक्षित करने के तरीके विकसित किए।

शुरुआत में विचारों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के संकेतों और चिह्नों का प्रयोग किया गया। धीरे-धीरे शब्दों और ध्वनियों को दर्शाने वाले चिह्न विकसित हुए और आगे चलकर विभिन्न लिपियों का निर्माण हुआ। समय के साथ इन चिह्नों में बदलाव आते रहे और वर्तमान लिपियाँ अपने विकसित रूप में सामने आईं।

आज भी लिपियों में सुधार और परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हिन्दी भाषा को लिखने के लिए वर्तमान में देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है और इसके अपने अलग लिपि-चिह्न हैं।

लिपि

मौखिक भाषा में विचार और भाव ध्वनियों के माध्यम से व्यक्त किए जाते हैं, जबकि लिखित भाषा में इन्हीं ध्वनियों को विशेष चिह्नों और वर्णों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। भाषा को लिखने की इसी व्यवस्थित पद्धति को लिपि कहते हैं।

हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसी प्रकार अंग्रेजी भाषा रोमन लिपि में और उर्दू भाषा मुख्य रूप से फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती है।

साहित्य

साहित्य की परिभाषा अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग तरीकों से दी है। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि ऐसे सुंदर और प्रभावशाली शब्दों की रचना, जो पाठक के मन को आनंदित करे और समाज के लिए भी उपयोगी हो, साहित्य कहलाती है।

हिन्दी साहित्य में अनेक महान कवियों, लेखकों और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कबीर, सूरदास, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद और निराला जैसे कवियों की रचनाएँ हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इसी प्रकार प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने वाली प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. व्याकरण किसे कहते हैं?

व्याकरण वह शास्त्र है, जिसमें किसी भाषा को शुद्ध रूप से बोलने, लिखने और समझने के नियमों का अध्ययन किया जाता है।

2. व्याकरण के कितने अंग होते हैं?

व्याकरण के मुख्यतः चार अंग माने जाते हैं—वर्ण-विचार, शब्द-विचार, पद-विचार और वाक्य-विचार।

3. हिन्दी व्याकरण का क्या महत्व है?

हिन्दी व्याकरण भाषा को सही, स्पष्ट और व्यवस्थित रूप से बोलने तथा लिखने में सहायता करता है। इससे भाषा की शुद्धता और एकरूपता बनी रहती है।

4. वर्ण-विचार क्या है?

वर्ण-विचार में भाषा की सबसे छोटी ध्वनि-इकाई यानी वर्ण, उसके भेद, उच्चारण और प्रयोग का अध्ययन किया जाता है।

5. हिन्दी भाषा की लिपि कौन-सी है?

हिन्दी भाषा मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।

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