Bhasha

भाषा (Bhasha): परिभाषा, प्रकार, उद्देश्य और भाषा की प्रकृति

भाषा (Bhasha) हमारे विचारों, भावनाओं और बातों को दूसरों तक पहुँचाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। भाषा की परिभाषा को सरल शब्दों में समझें तो जिस माध्यम से व्यक्ति अपने विचार और भावनाएँ दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाता है तथा उसकी बात को समझता है, उसे भाषा (Bhasha) कहते हैं। दैनिक जीवन में बातचीत, पढ़ाई, लेखन और विचारों के आदान-प्रदान के लिए भाषा का प्रयोग किया जाता है। इस लेख में हम भाषा की परिभाषा, इसके प्रकार, विशेषताएँ, उद्देश्य, महत्व और भाषा की प्रकृति को सरल शब्दों में समझेंगे। 

भाषा की परिभाषा – Bhasha Ki Paribhasha

भाषा (Bhasha) वह माध्यम है जिसकी सहायता से मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और मन की बात को दूसरों तक पहुँचाता है। हम भाषा के माध्यम से बोलकर, सुनकर, लिखकर और पढ़कर एक-दूसरे के विचारों को समझते हैं तथा अपने भाव व्यक्त करते हैं।

सरल शब्दों में कहा जाए तो जिस माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को दूसरे व्यक्ति तक स्पष्ट रूप से पहुँचाता है और सामने वाले के विचारों को समझता है, उसे भाषा कहते हैं।

मनुष्य के दैनिक जीवन में भाषा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। परिवार में बातचीत करने से लेकर विद्यालय में पढ़ाई, कार्यालय में कार्य, समाज में विचार-विनिमय और साहित्य के अध्ययन तक हर जगह भाषा का प्रयोग होता है।

भाषा की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ

डॉ. श्यामसुंदर दास के अनुसार, भाषा (Bhasha) वह माध्यम है जिसमें मनुष्य व्यक्त ध्वनि-संकेतों के द्वारा अपनी इच्छा, विचार और मत को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाता है तथा उसके विचारों को समझता है।

डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार, जिन ध्वनि-चिह्नों की सहायता से मनुष्य आपस में विचारों का आदान-प्रदान करता है, उन सभी को सामूहिक रूप से भाषा कहा जाता है।

इन परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि भाषा (Bhasha) केवल बोलने का साधन नहीं है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को व्यवस्थित ढंग से व्यक्त करता है और दूसरे लोगों के विचारों को ग्रहण करता है।

भाषा की प्रमुख विशेषताएँ – Bhasha Ki Visheshtayen

भाषा (Bhasha) की विभिन्न परिभाषाओं को समझने के बाद इसके कुछ प्रमुख आधार सामने आते हैं।

  1. भाषा में ध्वनि-संकेतों का परंपरागत और रूढ़ प्रयोग होता है।
  2. भाषा के सार्थक ध्वनि-संकेतों के माध्यम से विचारों और भावनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।
  3. भाषा किसी समाज या वर्ग के आंतरिक और बाहरी कार्यों तथा विचार-विनिमय में सहायता करती है।
  4. अलग-अलग समाज और वर्ग में प्रयुक्त भाषा या ध्वनि-संकेतों में अंतर पाया जा सकता है।

इस प्रकार भाषा व्यक्ति और समाज के बीच संचार का महत्वपूर्ण साधन है।

भाषा का विकास कैसे हुआ?

प्राचीन समय में मनुष्य अपने मन की बात समझाने के लिए संकेतों और इशारों का सहारा लेता था। लेकिन संकेतों के माध्यम से हर विचार को स्पष्ट करना हमेशा संभव नहीं था। आपने भी कभी दोस्तों के साथ बिना बोले इशारों से किसी बात को समझाने का खेल खेला होगा। ऐसी स्थिति में कई बार पूरी बात समझाना कठिन हो जाता है।

आदिमानव के सामने भी इसी प्रकार की समस्या रही होगी। इस कठिनाई को दूर करने के लिए मनुष्य ने अपने मुख से निकलने वाली विभिन्न ध्वनियों को मिलाकर शब्दों का निर्माण करना शुरू किया। धीरे-धीरे इन शब्दों के मेल से भाषा का विकास हुआ।

‘भाषा’ शब्द संस्कृत की ‘भाष्’ धातु से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है बोलना

उदाहरण के लिए, शिक्षक कक्षा में बोलकर विद्यार्थियों को विषय समझाते हैं और विद्यार्थी सुनकर उस जानकारी को ग्रहण करते हैं। बच्चा अपने माता-पिता से बोलकर अपनी आवश्यकता या भावना बताता है और माता-पिता उसकी बात सुनकर उसे समझते हैं। इसी तरह विद्यार्थी अपने विचार लिखकर व्यक्त करते हैं और शिक्षक उन्हें पढ़कर उनका मूल्यांकन करते हैं।

इस प्रकार भाषा (Bhasha) का प्रयोग मुख्य रूप से मनुष्य अपने विचारों और भावों के आदान-प्रदान के लिए करता है।

भाषा की मूल विशेषताएँ

भाषा (Bhasha) को समझने के लिए तीन बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं—

  1. भाषा ध्वनि-संकेतों पर आधारित होती है।
  2. भाषा के संकेत यादृच्छिक होते हैं।
  3. भाषा में प्रयुक्त संकेत रूढ़ होते हैं।

1. भाषा सार्थक ध्वनि-संकेत है

सार्थक शब्दों और संकेतों के समूह को भाषा कहा जाता है। भाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने जटिल विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।

सिर्फ कोई संकेत भाषा नहीं कहलाता। उदाहरण के लिए, रेलवे का गार्ड हरी झंडी दिखाकर यह संकेत देता है कि ट्रेन चलने वाली है। यह एक संकेत है, लेकिन इसे भाषा का सामान्य रूप नहीं माना जाता। हर व्यक्ति हर संकेत को एक ही अर्थ में नहीं समझ सकता और केवल संकेतों से विचारों को हमेशा पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं होता।

इसलिए भाषा में सार्थकता और स्पष्टता का होना आवश्यक है।

2. भाषा यादृच्छिक संकेत है

भाषा (Bhasha) में शब्द और उनके अर्थ के बीच हमेशा कोई तार्किक संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए बिल्ली, कौआ या घोड़ा जैसे शब्दों को इन्हीं नामों से क्यों पुकारा जाता है, इसका कोई निश्चित तार्किक कारण नहीं है। समाज ने इन शब्दों को स्वीकार किया और लंबे समय से उनका प्रयोग होता आ रहा है।

3. भाषा के संकेत रूढ़ होते हैं

भाषा में शब्दों का प्रयोग परंपरा से चला आ रहा होता है। किसी समाज में जिन शब्दों को लंबे समय से एक विशेष अर्थ में प्रयोग किया जाता है, वही आगे भी प्रचलित रहते हैं।

जैसे—औरत, बालक, वृक्ष आदि शब्दों का प्रयोग लंबे समय से होता आया है। समाज में इनके अर्थ और प्रयोग को स्वीकार कर लिया गया है। इसी कारण भाषा को रूढ़ ध्वनि-संकेतों की व्यवस्था भी कहा जाता है।

भाषा का महत्व Bhasha Ka Mahatva

भाषा (Bhasha) के माध्यम से हम केवल अपनी बात नहीं बताते, बल्कि अपनी इच्छाएँ, आवश्यकताएँ, खुशी, दुख, प्रेम, घृणा, क्रोध और संतोष जैसी भावनाएँ भी व्यक्त करते हैं।

सही शब्दों का चुनाव किसी कठिन परिस्थिति को आसान बना सकता है। इसके विपरीत, गलत या कठोर शब्द किसी अच्छे संबंध या काम को बिगाड़ सकते हैं।

हम अपनी भाषा के प्रयोग से किसी नाराज़ व्यक्ति को शांत कर सकते हैं और कभी-कभी किसी शांत व्यक्ति को भी उत्तेजित कर सकते हैं। भाषा के माध्यम से हम किसी व्यक्ति को प्रोत्साहित भी कर सकते हैं और हतोत्साहित भी।

इसलिए व्यक्ति की सफलता और असफलता में उसकी भाषायी क्षमता की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भाषा और व्यक्ति का व्यक्तित्व

किसी व्यक्ति की भाषा (Bhasha) उसके ज्ञान, विचार और व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बताती है। अच्छी, स्पष्ट और प्रभावशाली भाषा व्यक्ति को सम्मान दिला सकती है, जबकि अशुद्ध या असंगत भाषा उसके प्रभाव को कम कर सकती है।

भाषा से व्यक्ति की विद्वत्ता, सोचने की क्षमता, विचारों की गंभीरता, स्वभाव और सामाजिक व्यवहार का परिचय भी मिलता है। इसलिए हमें अपनी भाषा को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

भाषा को बेहतर बनाने के उपाय

भाषा (Bhasha) पर अच्छी पकड़ बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना उपयोगी है—

  • अपनी छोटी-छोटी भाषायी गलतियों को पहचानें और उन्हें सुधारने का प्रयास करें।
  • अपने आसपास के लोगों की भाषा पर ध्यान दें और अच्छे प्रयोगों को सीखें।
  • बच्चों की भाषा पर विशेष ध्यान दें ताकि शुरुआत से ही उनकी भाषा व्यवस्थित और स्पष्ट हो।
  • अच्छी और ज्ञानवर्धक पुस्तकों का नियमित अध्ययन करें।
  • नए शब्दों के अर्थ और उनके सही प्रयोग को समझें।
  • बोलने और लिखने की बेहतर शैली सीखने का प्रयास करें।
  • वाक्य बनाते समय उचित विशेषण और सटीक क्रिया-विशेषण का प्रयोग करें।
  • विराम-चिह्नों का सही स्थान पर उपयोग करें।
  • मुहावरों, लोकोक्तियों और प्रभावशाली अभिव्यक्तियों का उचित प्रयोग सीखें।
  • जिस भाषा का ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं, उसके व्यावहारिक व्याकरण को समझें।

भाषा परिवर्तनशील क्यों होती है?

भाषा (Bhasha) स्थिर नहीं होती। समय, समाज और परिस्थितियों के साथ इसमें लगातार परिवर्तन होता रहता है। नए शब्द भाषा में जुड़ते हैं, जबकि कुछ पुराने शब्द धीरे-धीरे कम प्रचलित हो जाते हैं।

भाषा के विकास में अलग-अलग समाजों और भाषाओं के बीच संपर्क की भी बड़ी भूमिका होती है। जब अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो वे एक-दूसरे के शब्दों को अपनाते हैं। इस प्रकार भाषाओं में नए शब्द और नए प्रयोग शामिल होते रहते हैं।

इसी कारण कोई भी भाषा हमेशा अपने पुराने या मूल रूप में नहीं रहती। समय के साथ उसमें बदलाव आते हैं और कई नए रूप विकसित होते हैं।

शब्दों के सरल रूप बनने के उदाहरण

भाषा (Bhasha) में शब्दों के उच्चारण और प्रयोग के कारण समय के साथ उनके सरल रूप विकसित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए—

मूल/पुराना रूपविकसित या सरल रूप
बाह्यबाह > बाहर
मध्यममुझ
सप्तत्रिंशतसैंतीस
मनस्कामनामनोकामना
दक्षिणदखिन > दाहिन > दहिन > दाहिना
परीक्षापरिखा > परख
अग्निआग
कुमारकुँवर
जायगाहजगह
लीचूलीची
ओपियमअफीम
लैन्टर्नलालटेन
बेयरिंगबैरंग
कैंडलकंदिल > कंडिल

इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि बोलने वालों की सुविधा के अनुसार शब्दों के रूप और उच्चारण में परिवर्तन आ सकता है।

भाषा के दो मुख्य आधार

किसी भाषा के दो प्रमुख आधार माने जाते हैं—

  1. मानसिक आधार (Psychical Aspect)
  2. भौतिक आधार (Physical Aspect)

मानसिक आधार

मानसिक आधार से उन विचारों और भावनाओं का संबंध है जिन्हें वक्ता भाषा के माध्यम से व्यक्त करना चाहता है। यानी मन में मौजूद विचार या भावना भाषा के माध्यम से बाहर आती है।

भौतिक आधार

भौतिक आधार भाषा की उन ध्वनियों से संबंधित है जिन्हें सुनने वाला ग्रहण करता है। इसमें ध्वनि, वर्ण, स्वराघात और अनुतान आदि शामिल होते हैं।

उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति ‘फूल’ शब्द बोलता है तो बोलने वाले के मन में उस शब्द का अर्थ मौजूद होता है और सुनने वाला भी उस ध्वनि को सुनकर उसका अर्थ समझता है।

इस प्रकार मानसिक आधार विचार या भाव को दर्शाता है, जबकि भौतिक आधार उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है। दोनों के मेल से भाषा का निर्माण होता है। इन्हें आंतरिक भाषा और बाह्य भाषा के रूप में भी समझा जाता है।

भाषा और समाज का संबंध

भाषा (Bhasha) समाज से प्राप्त होने वाली संपत्ति है। मनुष्य भाषा को समाज में रहकर सीखता है। बच्चे अपने माता-पिता, परिवार और आसपास के लोगों से भाषा का अनुकरण करते हुए उसे सीखते हैं।

हालाँकि अनुकरण हमेशा पूरी तरह समान नहीं होता। व्यक्ति के उच्चारण, समझ, शिक्षा, वातावरण और सामाजिक परिस्थितियों के कारण भाषा के प्रयोग में कुछ परिवर्तन आ सकता है।

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक भाषा पहुँचने के दौरान ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य और अर्थ में भी बदलाव हो सकते हैं। इसी प्रक्रिया के कारण भाषाएँ समय के साथ विकसित होती रहती हैं।

भाषा में परिवर्तन के कारण

भाषा के रूप और उच्चारण में बदलाव के कई कारण हो सकते हैं, जैसे—

  • शारीरिक भिन्नता
  • एकाग्रता की कमी
  • शिक्षा के स्तर में अंतर
  • उच्चारण में कठिनाई
  • भौतिक वातावरण
  • सांस्कृतिक प्रभाव
  • सामाजिक प्रभाव

उच्चारण में बदलाव के कुछ उदाहरण

भाषा के प्रयोग में होने वाले परिवर्तन को कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं—

प्रचलित रूपबदला हुआ रूप
तृष्णातिसना / टिसना
शिक्षासिच्छा
षड्यंत्रखड्यंत्र
रिपोर्टरपट
राजेन्द्ररजिन्दर / राजेन्दर
ट्रैजेडीत्रासदी
अंदाजअंजाद
लखनऊनखलऊ
परीक्षापरिच्छा
क्षत्रियछत्री
स्टेशनइस्टेशन / टिशन
स्कूलईसकूल
मास्टरमसटर / महटर
प्राणपरान
मतलबमतबल

इन उदाहरणों से पता चलता है कि बोलचाल और उच्चारण के प्रभाव से शब्दों के रूप बदल सकते हैं।

भाषा और बोली में अंतर

एक भाषा (Bhasha) के भीतर कई क्षेत्रीय बोलियाँ हो सकती हैं। सामान्यतः बोली किसी भाषा के सीमित क्षेत्र में बोले जाने वाले उस रूप को कहा जाता है जिसमें उच्चारण, शब्द, वाक्य-रचना, अर्थ या मुहावरों में कुछ स्थानीय विशेषताएँ दिखाई देती हैं।

भाषा का क्षेत्र अपेक्षाकृत व्यापक होता है, जबकि बोली का क्षेत्र सीमित होता है।

भाषा को सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक और व्यावसायिक स्तर पर व्यापक मान्यता मिल सकती है। दूसरी ओर, बोली को सामान्यतः क्षेत्रीय और सामाजिक स्तर पर अधिक पहचान मिलती है।

भाषा का अपना व्यवस्थित व्याकरण होता है, जबकि बोली का स्वरूप अधिक स्थानीय और व्यवहारिक होता है। फिर भी बोलियाँ भाषा को नए शब्द, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और अभिव्यक्तियाँ प्रदान करती हैं।

कई बार किसी बोली का लगातार विकास होता है और उसे व्यापक सामाजिक तथा साहित्यिक मान्यता मिल जाती है। ऐसी स्थिति में वह बोली आगे चलकर मानक भाषा का रूप ले सकती है।

मानक भाषा का बोलियों पर प्रभाव

जब किसी बोली को मानक भाषा के रूप में व्यापक स्वीकार्यता मिलती है तो उसका प्रभाव आसपास की बोलियों पर भी पड़ता है।

खड़ी बोली हिंदी ने ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली और मगही जैसी बोलियों को भी प्रभावित किया है। कई परिस्थितियों में मानक भाषा का प्रभाव इतना अधिक होता है कि कुछ स्थानीय बोलियों का प्रयोग धीरे-धीरे कम हो सकता है।

क्षेत्र के अनुसार भाषा के प्रयोग में अंतर को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है—

  • बिहार के बेगूसराय, खगड़िया और समस्तीपुर क्षेत्रों में: “हम कैह देंगे”, “हम नै करेंगे” आदि।
  • भोजपुर क्षेत्र में: “हमें लौक रहा है”, “हम काम किये” जैसे प्रयोग।
  • पंजाब क्षेत्र के प्रभाव में: “हमने जाना है” जैसे प्रयोग।
  • दिल्ली-आगरा क्षेत्र में: “वह कहवे था”, “मेरे को जाना है” जैसे प्रयोग।
  • कानपुर आदि क्षेत्रों में: “वह गया हैगा” जैसे प्रयोग।

इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्र और सामाजिक संपर्क के अनुसार भाषा के प्रयोग में विविधता आ सकती है।

भारत में भाषा परिवार

ग्रियर्सन के अनुसार भारत में विभिन्न भाषा-परिवारों और भाषाओं का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख रूप से निम्न परिवार बताए गए हैं—

1. भारोपीय भाषा परिवार

उत्तरी भारत में बोली जाने वाली कई भाषाओं को इस परिवार से जोड़ा जाता है।

2. द्रविड़ भाषा परिवार

इस परिवार में तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम जैसी भाषाएँ शामिल हैं।

3. आस्ट्रिक भाषा परिवार

इसमें संताली, मुंडारी, हो, सवेरा, खड़िया, कोरकू, भूमिज, गदवा, पलौंक, वा, खासी, मोन-ख्मेर और निकोबारी आदि भाषाओं का उल्लेख मिलता है।

4. तिब्बती-चीनी भाषा परिवार

इस परिवार में लुशेई, मेइथी, मारो, मिश्मी, अबोर-मिरी और अक आदि भाषाओं का उल्लेख किया गया है।

5. अवर्गीकृत भाषाएँ

बुरूशास्की और अंडमानी जैसी भाषाओं को इस श्रेणी में रखा गया है।

6. करेन तथा मन

इस वर्ग में बर्मा क्षेत्र की भाषाओं का उल्लेख मिलता है।

भाषा के प्रकार

सामान्य रूप से भाषा के तीन प्रमुख रूप बताए जाते हैं—

  1. मौखिक भाषा
  2. लिखित भाषा
  3. सांकेतिक भाषा

अब इन तीनों को विस्तार से समझते हैं।

1. मौखिक भाषा

जब कोई व्यक्ति बोलकर अपने विचार या भाव व्यक्त करता है और दूसरा व्यक्ति सुनकर उन्हें समझता है, तो इसे मौखिक भाषा कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, विद्यालय में होने वाली वाद-विवाद प्रतियोगिता में वक्ता बोलकर अपने विचार रखते हैं और श्रोता उन्हें सुनकर समझते हैं। यह मौखिक भाषा का उदाहरण है।

सरल शब्दों में, जिस भाषा को बोलकर व्यक्त किया जाता है और सुनकर समझा जाता है, उसे मौखिक भाषा कहते हैं।

मौखिक भाषा के उदाहरण

  • टेलीफोन पर बातचीत
  • भाषण
  • वार्तालाप
  • नाटक
  • रेडियो
  • दूरदर्शन
  • दैनिक बोलचाल

मौखिक भाषा को भाषा का प्राचीन और मूल रूप माना जाता है। मनुष्य ने लिखना सीखने से पहले बोलकर ही अपनी बात व्यक्त करना शुरू किया होगा। इसलिए भाषा के विकास में मौखिक रूप का विशेष महत्व है।

मौखिक भाषा की विशेषताएँ

मौखिक भाषा की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

  1. यह भाषा का अपेक्षाकृत अस्थायी रूप है।
  2. बोलने के बाद ध्वनि समाप्त हो जाती है।
  3. सामान्यतः वक्ता और श्रोता के बीच प्रत्यक्ष या तत्काल संपर्क होता है।
  4. इसकी मूल इकाई ध्वनि है।
  5. अलग-अलग ध्वनियों से शब्द बनते हैं और शब्दों से वाक्य तैयार होते हैं।
  6. मौखिक भाषा भाषा का मूल या प्रधान रूप मानी जाती है।

2. लिखित भाषा

जब कोई व्यक्ति अपने विचारों या भावनाओं को लिखकर व्यक्त करता है और दूसरा व्यक्ति उसे पढ़कर समझता है, तो इसे लिखित भाषा कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, कोई विद्यार्थी छात्रावास में रह रहा है और अपने माता-पिता को पत्र लिखकर अपनी कुशलता तथा आवश्यकताओं की जानकारी देता है। माता-पिता उस पत्र को पढ़कर उसकी बात समझते हैं। यह लिखित भाषा का उदाहरण है।

सरल शब्दों में, जिन लिखित अक्षरों या चिह्नों की सहायता से हम अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करते हैं, उसे लिखित भाषा कहते हैं।

लिखित भाषा के उदाहरण

  • पत्र
  • लेख
  • पत्रिका
  • समाचार-पत्र
  • कहानी
  • जीवनी
  • संस्मरण
  • पुस्तक
  • दस्तावेज

लिखित भाषा का विकास मौखिक भाषा के बाद हुआ। मनुष्य को जब यह आवश्यकता महसूस हुई कि वह अपनी बात दूर बैठे व्यक्ति तक या आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुँचा सके, तब लिखित रूप का विकास हुआ।

मौखिक ध्वनियों को स्थायी रूप देने के लिए अलग-अलग समुदायों ने विभिन्न प्रकार के लिखित चिह्न विकसित किए। इन्हीं चिह्नों को वर्ण या अक्षर कहा गया।

इस प्रकार मौखिक भाषा की मूल इकाई ध्वनि है, जबकि लिखित भाषा की मूल इकाई वर्ण माना जाता है।

लिखित भाषा की विशेषताएँ

  1. यह भाषा (Bhasha) का स्थायी रूप है।
  2. विचारों और भावनाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  3. इसमें लेखक और पाठक का आमने-सामने होना आवश्यक नहीं है।
  4. इसकी आधारभूत इकाई वर्ण या अक्षर है।
  5. लिखित भाषा मौखिक के बाद विकसित हुई और इसे भाषा का गौण रूप माना जाता है।

मौखिक और लिखित भाषा का महत्व

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भाषा का मूल या प्रधान रूप मौखिक माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति को लिखना-पढ़ना नहीं आता, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे भाषा का ज्ञान नहीं है।

किसी व्यक्ति को भाषा का ज्ञान होने का अर्थ यह भी है कि वह उस भाषा को सुनकर समझ सकता है और बोलकर अपने विचार दूसरे व्यक्ति तक पहुँचा सकता है।

लिखित भाषा (Likhit Bhasha) ने मौखिक भाषा को स्थायित्व प्रदान किया है। पुस्तकों, दस्तावेजों, ऐतिहासिक ग्रंथों और अन्य लिखित सामग्री के माध्यम से ज्ञान और विचार लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

3. सांकेतिक भाषा

जब किसी बात को इशारों या संकेतों के माध्यम से समझाया और समझा जाता है, तो उसे सांकेतिक भाषा कहा जाता है।

सरल शब्दों में, संकेतों के द्वारा विचार या संदेश व्यक्त करने की प्रक्रिया सांकेतिक भाषा कहलाती है।

सांकेतिक भाषा के उदाहरण

  • यातायात नियंत्रित करने वाले पुलिसकर्मी के संकेत
  • मूक-बधिर व्यक्तियों के बीच संकेतों के माध्यम से बातचीत
  • इशारों से किसी बात को समझाना

सांकेतिक भाषा में शब्दों की जगह संकेत और हाव-भाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पारंपरिक हिंदी व्याकरण के अध्ययन में इसे सामान्यतः मौखिक और लिखित भाषा की तरह विस्तार से नहीं पढ़ाया जाता।

भाषा का उद्देश्य

भाषा का मुख्य उद्देश्य संप्रेषण और विचारों का आदान-प्रदान करना है।

मनुष्य भाषा के माध्यम से अपने विचार, भावनाएँ, इच्छाएँ और आवश्यकताएँ दूसरे लोगों तक पहुँचाता है। साथ ही वह दूसरों की बात सुनकर या पढ़कर उनके विचारों को समझता भी है।

इसलिए भाषा व्यक्ति के बीच संबंध बनाने और समाज को व्यवस्थित रूप से चलाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

भाषा के उपयोग

भाषा विचारों के आदान-प्रदान का सबसे उपयोगी साधन है। मानव समाज की लगभग सभी गतिविधियों में किसी न किसी रूप में भाषा की आवश्यकता पड़ती है।

संकेतों के माध्यम से कही गई बात को समझने में कभी-कभी भ्रम की संभावना रहती है, लेकिन स्पष्ट भाषा का प्रयोग करके विचारों को अधिक आसानी से और सही अर्थ में दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है।

लिखित भाषा भी दैनिक जीवन में अत्यंत उपयोगी है। पत्र, पुस्तक, समाचार-पत्र, दस्तावेज और अन्य लिखित सामग्री इसके उदाहरण हैं।

लिखित रूप में सुरक्षित होने के कारण पुस्तकें और दस्तावेज लंबे समय तक ज्ञान को सुरक्षित रख सकते हैं। रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथ तथा ऐतिहासिक शिलालेख आज भी हमारे सामने उपलब्ध हैं क्योंकि उनके विचार लिखित रूप में सुरक्षित किए गए।

भाषा की प्रकृति

भाषा की प्रकृति से आशय भाषा (Bhasha) के उन गुणों और स्वभाव से है जिनके कारण वह निरंतर विकसित और परिवर्तित होती रहती है।

भाषा किसी स्थिर वस्तु की तरह नहीं रहती। यह समय और समाज के साथ बदलती रहती है। नए शब्द भाषा में शामिल होते हैं, पुराने शब्दों का प्रयोग कम हो सकता है और शब्दों के अर्थ या रूप में भी परिवर्तन आ सकता है।

भाषा एक सामाजिक शक्ति है। मनुष्य इसे अपने समाज और पूर्वजों से सीखता है तथा आगे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाता है।

भाषा परंपरागत होने के साथ-साथ अर्जित भी होती है। जीवित भाषा निरंतर प्रवाहमान रहती है और समय के अनुसार अपना रूप बदलती रहती है।

भाषा के प्रमुख रूप मौखिक और लिखित हैं। हम बोलकर और लिखकर इसका प्रयोग करते हैं। अलग-अलग देश, क्षेत्र और समय के कारण संसार में अनेक भाषाएँ और उनके विभिन्न रूप विकसित हुए हैं।

भाषा का निर्माण वाक्यों से होता है, वाक्य शब्दों से बनते हैं और शब्द मूल ध्वनियों से निर्मित होते हैं। इसलिए ध्वनि, शब्द और वाक्य भाषा के महत्वपूर्ण अंग हैं। व्याकरण में इन्हीं के विभिन्न रूपों और उनके आपसी संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भाषा क्या है?

भाषा (bhasha) वह माध्यम है जिससे हम अपने विचारों, भावनाओं और मन की बात दूसरों तक पहुँचाते हैं।

भाषा के कितने प्रकार होते हैं?

भाषा के तीन प्रमुख रूप होते हैं—मौखिक भाषा, लिखित भाषा और सांकेतिक भाषा।

भाषा की परिभाषा क्या है?

जिस माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाता है और उसकी बात समझता है, उसे भाषा कहते हैं।

मौखिक भाषा किसे कहते हैं?

जिस भाषा को बोलकर व्यक्त किया जाता है और सुनकर समझा जाता है, उसे मौखिक भाषा कहते हैं।

भाषा और बोली में क्या अंतर है?

भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है, जबकि बोली सामान्यतः किसी सीमित क्षेत्र में प्रयोग की जाने वाली भाषा का स्थानीय रूप होती है।

लिखित भाषा किसे कहते हैं?

जब विचारों और भावनाओं को लिखकर व्यक्त किया जाता है और दूसरा व्यक्ति उसे पढ़कर समझता है, उसे लिखित भाषा कहते हैं।

सांकेतिक भाषा क्या है?

जब किसी बात को इशारों या संकेतों के माध्यम से समझाया और समझा जाता है, उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं।

भाषा की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

भाषा ध्वनि-संकेतों पर आधारित होती है, इसके संकेत यादृच्छिक और रूढ़ होते हैं तथा यह विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान में सहायक होती है।

भाषा का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भाषा का मुख्य उद्देश्य संप्रेषण और विचारों का आदान-प्रदान करना है।

भाषा की प्रकृति कैसी होती है?

भाषा परिवर्तनशील और सामाजिक होती है। यह समय और समाज के साथ विकसित होती रहती है तथा इसमें नए शब्द और प्रयोग जुड़ते रहते हैं।

Scroll to Top